Tuesday, October 18, 2005

वो ज़माने अब कहाँ




(वो ज़माने अब कहाँ [गज़ल संग्रह]
प्रथम संस्करण- 2000
द्वितीय संस्करण- 2004





'वो ज़माने अब कहाँ' गज़ल संग्रह से नित्यानन्द तुषार की कुछ गज़लें-


[1]
खुद़ को इतना ख़राब मत करना
तू उसे बेनक़ाब मत करना

कोई गैऱों को कुछ नहीं देता
अपनों से कुछ हिसाब मत करना

टूटे दिल का इलाज क्या होगा
मुझपे ऐसा अज़ाब मत करना

आग लगने लगे जिसे सुनकर
फ़ैसला वो जनाब मत करना

चाहे कुछ भी 'तुषार' मिलता हो
अपनी नीयत ख़राब मत करना
***




[2]
जिनके घर आइना नहीं होता
उनको अपना पता नहीं होता

तब खुद़ा को ही याद करते हैं
जब कोई रास्ता नहीं होता

वक़्त के सब गुलाम होते हैं
उससे कोई बड़ा नहीं होता

सोचना है दिमाग से सोचो
दिल से कुछ फ़ैसला नहीं होता

वक़्त हमको बुरा बनाता है
शख्स़ कोई बुरा नहीं होता

ज़िन्दगी भर 'तुषार' क्या रोना
उससे कुछ फ़ायदा नहीं होता
***




[3]
ये सफ़र कितना कठिन है रास्तों को क्या पता
कैसे-कैसे हम बचे हैं हादसों को क्या पता

आँधियाँ चलतीं हैं तो फिर सोचतीं कुछ भी नहीं
टूटते हैं पेड़ कितने आँधियाँ को क्या पता

अपनी मर्जी से वो चूमें, अपने मन से छोड़ दें
किस क़दर बेबस हैं गुल ये तितलियों को क्या पता

एक पल में राख कर दें वो किसी का आशियाँ
कैसे घर बनता है यारो बिजलियों को क्या पता

आइने ये सोचते हैं सच कहा करते हैं वो
उनके चेहरे पर हैं चेहरे आइनों को क्या पता

जाने कब देखा था उसको आज तक उसके हैं हम
क़ीमती कितने थे वे पल उन पलों को क्या पता

जैसे वो हैं हम तो ऐसे हो नहीं सकते 'तुषार'
हम उन्हें भी चाहते हैं दुश्मनों को क्या पता
***




[4]
वक़्त लग जाएगा जगाने में
लोग सोए हैं इस ज़माने में

ख्व़ाब सबके हसीन होते हैं
उम्र लगती है उनको पाने में

दुश्मनों को भी मात करते हैं
दोस्त कैसे हैं इस ज़माने में

अब जो हमदर्द बनके आए हैं
वो भी शामिल हैं घर जलाने में

लोग इतना नहीं समझ पाते
क्या बिगड़ता है मुस्कराने में

सच को सच जो 'तुषार' कहते हैं
वो ही रहते हैं अब निशाने में
***





[5]
अब न कोई मुगालता रखना
अपने कद का पता सदा रखना

घर सलामत रखे तुम्हारा जो
दोस्तों से वो फ़ासला रखना

वक़्त के साथ मत बदल जाना
प्यार के पेड़ को हरा रखना

दूर है जो क़रीब होगा वो
अपने होठों पे बस दुआ रखना

मन्ज़िलों पर अगर नज़र है तो
अपनी नज़रों में रास्ता रखना

मिलना-जुलना 'तुषार' मुश्किल हो
फ़ोन करने का सिलसिला रखना
***




[6]
मेरी आँखों से मेरे दिल में समाने वाला
है कहाँ वो मेरे दिन रात सजाने वाला

जब भी मिलना हो किसी से ज़रा दूरी रखना
जान ले लेता है सीने से लगाने वाला

बद्दुआओं का असर रंग दिखाता ही है
ख़ुश न रह पाएगा औरों को सताने वाला

देखते जाओ अभी और यहाँ क्या होगा
वक़्त कैसा है ये रिश्तों को जलाने वाला

क्या वतन आग की लपटों में जलेगा यूँ ही
कोई दिखता ही नहीं आग बुझाने वाला

जो भी मिलता है वो कुछ दिन में बिछड़ जाता है
कोई मिलता ही नहीं साथ निभाने वाला

वो जो मिल जाए तो कहना ये 'तुषार' उससे तुम
कितना बिखरा है तेरे ख्व़ाब सजाने वाला
***




[7]
मुहब्बत की बारिश में भीगा हुआ हूँ
तेरे बाद भी तुझमें डूबा हुआ हूँ

हुआ कैसा जादू अचानक ये मुझ पर
तुझे देखते ही मैं तेरा हुआ हूँ

वो इक पल का मिलना बिछड़ना सदा का
ज़रा देख मैं कितना बिखरा हुआ हूँ

तेरी ख़ुशबू से मैं महकता हूँ हर पल
तेरा ख्व़ाब हूँ पर मैं टूटा हुआ हूँ

मुलाक़ात जिस मोड़ पर हो गई थी
अभी भी वहीं पर मैं ठहरा हुआ हूँ

'तुषार' उसका हँसना बहुत याद आए
कोई उससे कह दे मैं उलझा हुआ हूँ
***




[8]
मुक़द्दर आज़माना चाहते हैं
तुम्हें अपना बनाना चाहते हैं

तुम्हारे वास्ते क्या सोचते हैं
निगाहों से बताना चाहते हैं

गल़त क्या है जो हम दिल माँग बैठे
परिन्दे भी ठिकाना चाहते हैं

परिस्थितियाँ ही अक्सर रोकतीं हैं
मुहब्बत सब निभाना चाहते हैं

बहुत दिन से इन आँखों में हैं आँसू
'तुषार' अब मुस्कराना चाहते हैं
***


-नित्यानन्द तुषार


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