Tuesday, October 18, 2005

दूरियों के दिन


(दूरियों के दिन [गज़ल संग्रह]
प्रथम संस्करण- 1992
द्वितीय संस्करण- 2000


'दूरियों के दिन' गज़ल-संग्रह से नित्यानन्द तुषार की कुछ गज़लें-


[1]
ज़िन्दगी में जब हमारी ज़िन्दगी आने लगी
तब उदासी घर हमारा छोड़कर जाने लगी

उँगलियों से छू दिया जिस चीज़ को तुमने ज़रा
सच कहें तो चीज़ वो मन को बहुत भाने लगी

सुर्ख होंठों से लगाकर जिनको तुम केवल पढ़ो
ख़त बहुत ऐसे तुम्हारी याद लिखवाने लगी

तुम न जब तक मिल सके थे पत्थरों-सी मौन थी
तुम मिले तो ज़िन्दगी की कोकिला गाने लगी

प्यार का जब नाम लोगों ने लिया था एक दिन
तब तुम्हारी छवि उभरकर और मुस्काने लगी

होश भी उड़ ही गए थे एक दिन उस बाग में
जब तुम्हारी साँस मेरे पाँव बहकाने लगी
***



[2]
हम भटकते हैं पर अब वफ़ा के वास्ते
चोट खाते हैं बहुत हम इस ख़ता के वास्ते

जिसका बच्चा भूख से बेहाल है उस हाल में
दूध, मन्दिर ले गया क्यूँ देवता के वास्ते

चार दिन से उनकी बेटी कुछ अधिक बीमार थी
बालकों की गुल्लकें तोडीं दवा के वास्ते

उन सभी की चाल को पहचानती है अब नज़र
दोस्ती करने लगे जो फिर दगा के वास्ते

बस ज़रा-सा फ़र्क उनमें और हममें है यही
वो ख़िताबों के लिए हैं हम सज़ा के वास्ते

बन्द कमरे की घुटन में मन बहुत बेचैन है
खिड़कियों को खोल दो ताज़ा हवा के वास्ते
***




[3]
जो रहे सबके लबों पर उस हँसी को ढूँढ़िए
बँट सके सबके घरों में उस खुश़ी को ढूँढ़िए

देखिए तो आज सारा देश ही बीमार है
हो सके उपचार जिससे उस जड़ी को ढूँढ़िए

काम मुश्किल है बहुत पर कह रहा हूँ आपसे
हो सके तो भीड़ में से आदमी को ढ़ूढ़िए

हर दिशा में आजकल बारूद की दुर्गन्ध है
जो यहाँ ख़ुशबू बिखेरे उस कली को ढूँढ़िए

प्यास लगने से बहुत पहले हमेशा दोस्तो
जो न सूखी हो कभी भी उस नदी को ढूँढ़िए

शहर-भर में हर जगह तो हादसों की भीड़ है
हँस सकें हम सब जहाँ पर उस गली को ढूँढ़िए

क़त्ल, धोखा, लूट, चोरी तो यहाँ पर आम हैं
रहजनों से जो बची उस पालकी को ढूँढ़िए
***




[4]
धुंध-सी छाई हुई है आज घर के सामने
कुछ नज़र आता नहीं है अब नज़र के सामने

सिर कटाओ या हमारे सामने सजदा करो
शर्त ये रख दी गई है हर बशर के सामने

सोचता हूँ क्यूँ अदालत ने बरी उसको किया
क़त्ल करके जो गया सारे नगर के सामने

देर तक देखा मुझे और फिर किसी ने ये कहा
आज तो मुझको पढ़ो, मैं हूँ नज़र के सामने

कल सड़क पर मर गए थे ठंड से कुछ आदमी
देश की उन्नति बताते पोस्टर के सामने

लौटना मत बीच से पूरा करो अपना सफ़र
हल करो वो मुश्किलें जो हैं डगर के सामने
***




[5]
मुहब्बत की कहानी में सदा ये ही हुआ होगा
खुश़ी, सपने, तड़प, आँसू, गम़ों का सिलसिला होगा

किसी की आँख में आँसू किसी के होंठ पर सरगम
किसी का दिल जला होगा किसी का घर बसा होगा

युगों से हम भटकते हैं तुम्हारे वास्ते देखो
तुम्हारा नाम दिल पर तो ख़ुदा ने ही लिखा होगा

तुम्हें शायद कभी इस बात का अहसास भी होगा
कि मर-मरकर यहाँ पर भी कभी कोई जिया होगा

नहीं कोई कमी हममें जरा-सा फर्क ये होगा
हमारे घर अँधेरा है वहाँ दीपक जला होगा

'तुषार' उसकी मुहब्बत का करिश्मा ये हुआ होगा
न हो पाया जो उसका, वो, उसी का हो गया होगा
***




[6]
हमेशा पास रहते हैं मगर पल-भर नहीं मिलते
बहुत चाहो जिन्हें दिल से वही अक्सर नहीं मिलते

ज़रा ये तो बताओ तुम हुनर कैसे दिखाएँ वो
यहाँ जिन बुत-तरासों को सही पत्थर नहीं मिलते

हमें ऐसा नहीं लगता यहाँ पर वार भी होगा
यहाँ के लोग हमसे तो कभी हँसकर नहीं मिलते

हमारी भी तमन्ना थी उड़ें आकाश में लेकिन
विवश होकर यही सोचा सभी को पर नहीं मिलते

ग़ज़ब का खौफ छाया है हुआ क्या हादसा यारो
घरों से आजकल बच्चे हमें बाहर नहीं मिलते

हकीकत में उन्हें पहचान अवसर की नहीं कुछ भी
जिन्होंने ये कहा अक्सर, हमें अवसर नहीं मिलते
***




[7]
ख़ुद से बाहर अब निकलकर देखें
दूसरों के गम़ भी चलकर देखें

टूटने पर टूट जाएगा दिल
आप सपनों को सँभलकर देखें

रोशनी देते रहे जो कल तक
उनकी खात़िर आज जलकर देखें

ये बहुत मुश्किल सही फिर भी हम
इस जहाँ को ही बदलकर देखें

उनको गिरने से बचा लेना तुम
जो ये सोचें हम फिसलकर देखें
***




[8]
ज़िन्दगी की इक हक़ीकत आपसे कहता हूँ मैं
बिजलियों के दरमियाँ ही रात-दिन रहता हूँ मैं

तैरता है जिसका चेहरा मेरे दिल की झील में
उसकी ख़ुशबू से महककर ही ग़ज़ल कहता हूँ मैं

ख्व़ाब जब भी टूटते हैं ख़ुश्क पत्तों की तरह
रेत की दीवार-सा तब एकदम ढहता हूँ मैं

आँसुओं का है समन्दर मेरे दिल के बीच में
लोग ऐसा सोचते हैं ख़ुश बहुत रहता हूँ मैं

है वही सब कुछ मेरा जिसके लिए मैं कुछ नहीं
क्या बताऊँ किस तरह इस दर्द को सहता हूँ मैं

मन मेरा पागल हवा था एक वो भी दौर था
अब तो मन के साथ कमरे में पड़ा रहता हूँ मैं

लौटकर बरसेंगे उसके प्यार के बादल 'तुषार'
इस भरोसे में जुदाई की तपिश सहता हूँ मैं
***

-नित्यानन्द तुषार

4 Comments:

At 8:46 PM, Anonymous Anonymous said...

आपकी गज़लें बहुत ही सुन्दर हैं।
नेट पर पढ़कर बहुत अच्छा लग रहा है।
-नित्यगोपाल कटारे

 
At 11:55 PM, Blogger Abhi said...

बहुत ही मार्मिक लिखा है आप ने, दिल को छू लिया आपकी ग़ज़लों ने | लिखते रहिये ऐसे ही |

 
At 6:40 AM, Blogger kavideepakgupta said...

This comment has been removed by the author.

 
At 6:41 AM, Blogger kavideepakgupta said...

Tushar Bhai
Badhai.....man ko chhoone wali ghazlein kahin hain aapne.....kabhi ghaziabad aaunga to aapka sanklan loonga aapse.

Aapka
Kavi Deepak Gupta
www.kavideepakgupta.com

 

Post a Comment

<< Home