Tuesday, October 18, 2005

सितम की उम्र छोटी है


(सितम की उम्र छोटी है [गज़ल संग्रह]
प्रथम संस्करण- 1996
चतुर्थ संस्करण- 2005



'सितम की उम्र छोटी है' गज़ल संग्रह से नित्यानन्द तुषार की कुछ गज़लें-


[1]
मेरा अपना तजुर्बा है इसे सबको बता देना
हिदायत से तो अच्छा है किसी को मशवरा देना।

अभी हम हैं हमारे बाद भी होगी हमारी बात
कभी मुमकिन नहीं होता किसी को भी मिटा देना

नई दुनिया बनानी है नई दुनिया बसाएँगे
सितम की उम्र छोटी है जरा उनको बता देना

अगर कुछ भी जले अपना बड़ी तकलीफ़ होती है
बहुत आसान होता है किसी का घर जला देना

मेरी हर बात पर कुछ देर तो वो चुप ही रहता है
मुझे मुश्किल में रखता है फिर उसका मुस्करा देना

'तुषार' अच्छा है अपनी बात को हम खुद़ ही निपटा लें
ज़माने की है आदत सिर्फ शोलों को हवा देना
****


[2]
तुम्हें ख़ूबसूरत नज़र आ रही हैं
ये राहें तबाही के घर जा रही हैं

अभी तुमको शायद पता भी नहीं है
तुम्हारी अदाएँ सितम ढा रही हैं

कहीं जल न जाए नशेमन हमारा
हवाएँ भी शोलों को भड़का रही हैं

हम अपने ही घर में पराये हुए हैं
सियासी निगाहें ये समझा रही हैं

गल़त फ़ैसले नाश करते रहे हैं
लहू भीगी सदियाँ ये बतला रही हैं

'तुषार' उनकी सोचों को सोचा तो जाना
दिलों में वो नफरत फैला रही हैं
****



[3]
मैंने कुछ समझा नहीं था तुमने कुछ सोचा नहीं
वरना जो कुछ भी हुआ है वो कभी होता नहीं

उससे मैं यूँ ही मिला था सिर्फ मिलने के लिए
उससे मिलकर मैंने जाना उससे कुछ अच्छा नहीं

आप मानें या न मानें मेरा अपना है यक़ीन
ख़ूबसूरत ख्व़ाब से बढ़कर कोई धोखा नहीं

जाने क्यूँ मैं सोचता हूँ उसको अब भी रात दिन
मेरी ख़ातिर जिसके दिल में प्यार का जज़्बा नहीं

मेरी नज़रों से जुदा वो मेरे दिल में है 'तुषार'
वो मेरा सब कुछ मैं जिसकी सोच का हिस्सा नहीं
****



[4]
जो रिश्ते हैं हक़ीक़त में वो अब रिश्ते नहीं होते
हमें जो लगते हैं अपने वही अपने नहीं होते

कशिश होती है कुछ फूलों में पर ख़ुशबू नहीं होती
ये अच्छी सूरतों वाले सभी अच्छे नहीं होते

वतन की जो तरक़्क़ी है अभी तो वो अधूरी है
वो घर भी हैं, दवाई के जहाँ पैसे नहीं होते

इन्हें जो भी बनाते हैं वो हम तुम ही बनाते हैं
किसी मज़हब की साजिश में कभी बच्चे नहीं होते

सभी के पेट को रोटी, बदन पे कपड़े,सर पे छत
बहुत अच्छे हैं ये सपने मगर सच्चे नहीं होते

पसीने की सियाही से जो लिखते हैं इरादों को
'तुषार' उनके मुक़द्दर के सफ़े कोरे नहीं होते
****



[5]
हवा जब तेज़ चलती है तो पत्ते टूट जाते हैं
मुसीबत के दिनों में अच्छे-अच्छे टूट जाते हैं

बहुत मजबूर हैं हम झूठ तो बोला नहीं जाता
अगर सच बोलते हैं हम तो रिश्ते टूट जाते हैं

बहुत मुश्किल सही फिर भी मिज़ाज अपना बदल लो तुम
लचक जिनमें नहीं होती तने वे टूट जाते हैं

भले ही देर से आए मगर वो वक़्त आता है
हक़ीक़त खुल ही जाती है मुखौटे टूट जाते हैं

अभी दुनिया नहीं देखी तभी वो पूछते हैं ये
किसी का दिल, किसी के ख्व़ाब कैसे टूट जाते हैं

'तुषार' इतना ही क्या कम है तुम्हें वो देखते तो हैं
अगर कुछ रौशनी हो तो अँधेरे टूट जाते हैं
***



[6]
इश्क़ की इंतिहा हो गई
एक सूरत ख़ुदा हो गई

उनसे जैसे ही नज़रें मिलीं
ज़िन्दगी ख़ुशनुमा हो गई

उनको पाना करिश्मा हुआ
बद्दुआ भी दुआ हो गई

ये महुब्बत भी क्या चीज़ है
धीरे-धीरे नशा हो गई

जो हुआ भूल जाओ 'तुषार'
उनकी सीरत पता हो गई
***



[7]
अधूरी ज़िन्दगी महसूस होती है
मुझे तेरी कमी महसूस होती है

मुझे देखा, मुझे सोचा, मुझे भूले
मुझे ये बात भी महसूस होती है

हमेशा साथ रहने की क़सम खाई
क़सम तेरी बड़ी भी महसूस होती है

बदन तेरा है उसमें जान मेरी है
तुझे क्या ये कभी महसूस होती है

'तुषार' उसको बहुत दिन से नहीं देखा
इन आँखों में नमी महसूस होती है
***


-नित्यानन्द तुषार

2 Comments:

At 9:24 AM, Anonymous Anonymous said...

Tushar ji Aapki gazalein dil ko choo jane bali hain. kitni saral, kitni sahaj aur kitni asardar. Aapka gazal sangrah kahan mil sakta hai?
Rakesh Sanjana, Bhutan

 
At 6:37 AM, Blogger kavideepakgupta said...

wah wah

 

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